देशभर के विद्वानों और कला-संस्कृति जगत ने सराहा ‘स्वर सरिता’ का सांस्कृतिक अभियान
पुराने पत्र और पोस्टकार्ड बने गवाह—राजस्थानी लोककला, संगीत और भारतीय संस्कृति के संरक्षण में ‘स्वर सरिता’ के योगदान को मिली व्यापक सराहना
जयपुर। समय के साथ पुराने पत्र और पोस्टकार्ड केवल कागज के दस्तावेज नहीं रहते, बल्कि किसी संस्था की यात्रा, प्रतिष्ठा और उसके कार्यों के प्रभाव का जीवंत इतिहास बन जाते हैं। ‘स्वर सरिता’ को वर्ष 2009 से 2012 के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से प्राप्त अनेक प्रशंसा-पत्र आज इसी गौरवपूर्ण सांस्कृतिक यात्रा की गवाही देते हैं।
इन पत्रों में संगीत, साहित्य, लोककला, शिक्षा और संस्कृति से जुड़े प्रतिष्ठित विद्वानों, कलाकारों, शिक्षाविदों और संस्थानों ने ‘स्वर सरिता’ के प्रकाशन, संपादन और भारतीय लोक-संस्कृति के संरक्षण के प्रयासों की सराहना की है। कई पत्र सीधे श्री के.सी. मालू को संबोधित हैं, जिनमें उनके नेतृत्व में प्रकाशित ‘स्वर सरिता’ को राजस्थान की कला-संस्कृति और लोक परंपराओं को व्यापक मंच देने वाला महत्वपूर्ण प्रयास बताया गया है।
राजस्थान सरकार के डॉ. राधाकृष्णन राज्य केंद्रीय पुस्तकालय, जयपुर की ओर से वर्ष 2009 में भेजे गए पत्र में ‘स्वर सरिता’ के सितंबर-अक्टूबर अंक की कला एवं संस्कृति संबंधी सामग्री को उपयोगी और उत्कृष्ट बताते हुए पत्रिका की निरंतर प्रगति की कामना की गई। पुस्तकालय ने पत्रिका के पूर्व में प्राप्त अंकों को भी पाठकों द्वारा पसंद किए जाने का उल्लेख किया।
टैगोर पब्लिक स्कूल, जयपुर के निदेशक पी.डी. सिंह ने दिसंबर 2009 में भेजे अपने पत्र में ‘स्वर सरिता’ में प्रकाशित भारतीय परंपरा, लोकगीत, लोकनृत्य और चित्रकला से संबंधित सामग्री की प्रशंसा की। उन्होंने राजस्थान की बहुआयामी कला के संरक्षण और उन्नयन में किए जा रहे प्रयासों को उल्लेखनीय बताया।
बनस्थली विश्वविद्यालय की ललित कला संकाय की डीन प्रो. ईना शास्त्री ने भी पत्रिका को भारतीय संस्कृति, कला और संगीत को संजोकर जन-जन तक पहुंचाने वाला सराहनीय प्रयास बताया। उन्होंने विद्यार्थियों और अध्यापकों को भी ‘स्वर सरिता’ से जोड़ने की इच्छा व्यक्त की।
वरिष्ठ चित्रकार डॉ. नाथू लाल वर्मा द्वारा भेजे गए पत्र में वीणा समूह के सांस्कृतिक आयोजनों और राजस्थान की गीत-संगीत परंपरा के संरक्षण की विशेष सराहना की गई। इसी प्रकार लोककला के प्रतिष्ठित अध्येता डॉ. महेंद्र भानावत ने ‘स्वर सरिता’ के विभिन्न अंकों में प्रकाशित सामग्री की प्रशंसा करते हुए इसे राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत से पाठकों को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण माध्यम माना।
वरिष्ठ संगीतकार एवं साहित्यकार पंडित विनयशंकर मिश्र सहित अनेक विद्वानों ने भी अपने हस्तलिखित पत्रों और पोस्टकार्डों के माध्यम से पत्रिका के विषय-चयन, प्रस्तुति और सांस्कृतिक दृष्टि की प्रशंसा की। नई दिल्ली के एस.एम. नाहटा ने पत्रिका के माध्यम से राजस्थानी संस्कृति के ज्ञानवर्धक इतिहास को पाठकों तक पहुंचाने के प्रयास की सराहना करते हुए श्री के.सी. मालू के समर्पण की विशेष चर्चा की।
इन अभिलेखों में केवल पत्रिका की प्रशंसा ही नहीं, बल्कि वीणा समूह की सांस्कृतिक गतिविधियों की छाप भी दिखाई देती है। जनवरी 2010 में वी.एन. चांडक ने राजस्थान से बाहर आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में वीणा समूह के कलाकारों की प्रस्तुति की प्रशंसा करते हुए लिखा कि कलाकारों ने दर्शकों को देर रात तक बांधे रखा। यह उस दौर में वीणा के संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाता है।
कागज पर लिखी प्रशंसा, आज सांस्कृतिक इतिहास
ई-मेल और सोशल मीडिया से पहले के दौर में किसी पत्रिका के संपादक तक देश के विभिन्न शहरों से पहुंचने वाले ये हाथ से लिखे पोस्टकार्ड और औपचारिक पत्र विशेष महत्व रखते हैं। इनमें कहीं किसी अंक की सामग्री की चर्चा है, कहीं लोकसंगीत और संस्कृति के संरक्षण के प्रयास की प्रशंसा, तो कहीं भविष्य में भी इस सांस्कृतिक यात्रा को जारी रखने की शुभकामनाएं।
‘स्वर सरिता’ को मिले ये पत्र इस बात का प्रमाण हैं कि यह पत्रिका केवल एक प्रकाशन नहीं रही, बल्कि संगीत, साहित्य, लोककला और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनी।
श्री के.सी. मालू के मार्गदर्शन और सांस्कृतिक दृष्टि से आगे बढ़ी यह यात्रा राजस्थान की लोकधुनों, लोककलाओं और परंपराओं को दस्तावेजबद्ध करने के साथ-साथ देश के विद्वानों और कला-प्रेमियों को भी एक साझा मंच से जोड़ती रही।
आज जब इन पुराने पत्रों और पोस्टकार्डों के पन्ने फिर से सामने आते हैं, तो उनमें लिखे शब्द एक पूरे दौर की कहानी कहते हैं—एक ऐसा दौर, जब ‘स्वर सरिता’ के प्रत्येक अंक की प्रतीक्षा होती थी और पाठक अपनी प्रतिक्रिया बाकायदा पत्र लिखकर जयपुर भेजते थे।
देशभर के विद्वानों और कला-संस्कृति जगत ने सराहा ‘स्वर सरिता’ का सांस्कृतिक अभियान
पुराने पत्र और पोस्टकार्ड बने गवाह—राजस्थानी लोककला, संगीत और भारतीय संस्कृति के संरक्षण में ‘स्वर सरिता’ के योगदान को मिली व्यापक सराहना
जयपुर। समय के साथ पुराने पत्र और पोस्टकार्ड केवल कागज के दस्तावेज नहीं रहते, बल्कि किसी संस्था की यात्रा, प्रतिष्ठा और उसके कार्यों के प्रभाव का जीवंत इतिहास बन जाते हैं। ‘स्वर सरिता’ को वर्ष 2009 से 2012 के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से प्राप्त अनेक प्रशंसा-पत्र आज इसी गौरवपूर्ण सांस्कृतिक यात्रा की गवाही देते हैं।
इन पत्रों में संगीत, साहित्य, लोककला, शिक्षा और संस्कृति से जुड़े प्रतिष्ठित विद्वानों, कलाकारों, शिक्षाविदों और संस्थानों ने ‘स्वर सरिता’ के प्रकाशन, संपादन और भारतीय लोक-संस्कृति के संरक्षण के प्रयासों की सराहना की है। कई पत्र सीधे श्री के.सी. मालू को संबोधित हैं, जिनमें उनके नेतृत्व में प्रकाशित ‘स्वर सरिता’ को राजस्थान की कला-संस्कृति और लोक परंपराओं को व्यापक मंच देने वाला महत्वपूर्ण प्रयास बताया गया है।
राजस्थान सरकार के डॉ. राधाकृष्णन राज्य केंद्रीय पुस्तकालय, जयपुर की ओर से वर्ष 2009 में भेजे गए पत्र में ‘स्वर सरिता’ के सितंबर-अक्टूबर अंक की कला एवं संस्कृति संबंधी सामग्री को उपयोगी और उत्कृष्ट बताते हुए पत्रिका की निरंतर प्रगति की कामना की गई। पुस्तकालय ने पत्रिका के पूर्व में प्राप्त अंकों को भी पाठकों द्वारा पसंद किए जाने का उल्लेख किया।
टैगोर पब्लिक स्कूल, जयपुर के निदेशक पी.डी. सिंह ने दिसंबर 2009 में भेजे अपने पत्र में ‘स्वर सरिता’ में प्रकाशित भारतीय परंपरा, लोकगीत, लोकनृत्य और चित्रकला से संबंधित सामग्री की प्रशंसा की। उन्होंने राजस्थान की बहुआयामी कला के संरक्षण और उन्नयन में किए जा रहे प्रयासों को उल्लेखनीय बताया।
बनस्थली विश्वविद्यालय की ललित कला संकाय की डीन प्रो. ईना शास्त्री ने भी पत्रिका को भारतीय संस्कृति, कला और संगीत को संजोकर जन-जन तक पहुंचाने वाला सराहनीय प्रयास बताया। उन्होंने विद्यार्थियों और अध्यापकों को भी ‘स्वर सरिता’ से जोड़ने की इच्छा व्यक्त की।
वरिष्ठ चित्रकार डॉ. नाथू लाल वर्मा द्वारा भेजे गए पत्र में वीणा समूह के सांस्कृतिक आयोजनों और राजस्थान की गीत-संगीत परंपरा के संरक्षण की विशेष सराहना की गई। इसी प्रकार लोककला के प्रतिष्ठित अध्येता डॉ. महेंद्र भानावत ने ‘स्वर सरिता’ के विभिन्न अंकों में प्रकाशित सामग्री की प्रशंसा करते हुए इसे राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत से पाठकों को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण माध्यम माना।
वरिष्ठ संगीतकार एवं साहित्यकार पंडित विनयशंकर मिश्र सहित अनेक विद्वानों ने भी अपने हस्तलिखित पत्रों और पोस्टकार्डों के माध्यम से पत्रिका के विषय-चयन, प्रस्तुति और सांस्कृतिक दृष्टि की प्रशंसा की। नई दिल्ली के एस.एम. नाहटा ने पत्रिका के माध्यम से राजस्थानी संस्कृति के ज्ञानवर्धक इतिहास को पाठकों तक पहुंचाने के प्रयास की सराहना करते हुए श्री के.सी. मालू के समर्पण की विशेष चर्चा की।
इन अभिलेखों में केवल पत्रिका की प्रशंसा ही नहीं, बल्कि वीणा समूह की सांस्कृतिक गतिविधियों की छाप भी दिखाई देती है। जनवरी 2010 में वी.एन. चांडक ने राजस्थान से बाहर आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में वीणा समूह के कलाकारों की प्रस्तुति की प्रशंसा करते हुए लिखा कि कलाकारों ने दर्शकों को देर रात तक बांधे रखा। यह उस दौर में वीणा के संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाता है।
कागज पर लिखी प्रशंसा, आज सांस्कृतिक इतिहास
ई-मेल और सोशल मीडिया से पहले के दौर में किसी पत्रिका के संपादक तक देश के विभिन्न शहरों से पहुंचने वाले ये हाथ से लिखे पोस्टकार्ड और औपचारिक पत्र विशेष महत्व रखते हैं। इनमें कहीं किसी अंक की सामग्री की चर्चा है, कहीं लोकसंगीत और संस्कृति के संरक्षण के प्रयास की प्रशंसा, तो कहीं भविष्य में भी इस सांस्कृतिक यात्रा को जारी रखने की शुभकामनाएं।
‘स्वर सरिता’ को मिले ये पत्र इस बात का प्रमाण हैं कि यह पत्रिका केवल एक प्रकाशन नहीं रही, बल्कि संगीत, साहित्य, लोककला और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनी।
श्री के.सी. मालू के मार्गदर्शन और सांस्कृतिक दृष्टि से आगे बढ़ी यह यात्रा राजस्थान की लोकधुनों, लोककलाओं और परंपराओं को दस्तावेजबद्ध करने के साथ-साथ देश के विद्वानों और कला-प्रेमियों को भी एक साझा मंच से जोड़ती रही।
आज जब इन पुराने पत्रों और पोस्टकार्डों के पन्ने फिर से सामने आते हैं, तो उनमें लिखे शब्द एक पूरे दौर की कहानी कहते हैं—एक ऐसा दौर, जब ‘स्वर सरिता’ के प्रत्येक अंक की प्रतीक्षा होती थी और पाठक अपनी प्रतिक्रिया बाकायदा पत्र लिखकर जयपुर भेजते थे।