स्वर सरिता: संगीत, साहित्य और राजस्थानी संस्कृति को समर्पित एक गौरवशाली यात्रा

वीणा समूह द्वारा प्रकाशित “स्वर सरिता”

स्वर सरिता: संगीत, साहित्य और राजस्थानी संस्कृति को समर्पित एक गौरवशाली यात्रा
स्वर सरिता: संगीत, साहित्य और राजस्थानी संस्कृति को समर्पित एक गौरवशाली यात्रा

स्वर सरिता: संगीत, साहित्य और राजस्थानी संस्कृति को समर्पित एक गौरवशाली यात्रा

राजस्थान की धरती केवल वीरता और इतिहास के लिए ही नहीं, बल्कि अपने लोकगीतों, लोकनृत्यों, संगीत, साहित्य और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी विश्वभर में प्रसिद्ध है। इसी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने, नई पीढ़ी तक पहुँचाने और कलाकारों को एक सम्मानजनक मंच देने की भावना के साथ वीणा समूह द्वारा प्रकाशित “स्वर सरिता” ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।

श्री के. सी. मालू के मार्गदर्शन में “स्वर सरिता” केवल एक पत्रिका नहीं रही, बल्कि संगीत, कला, साहित्य और संस्कृति के बीच संवाद स्थापित करने वाला एक महत्वपूर्ण माध्यम बनी। बाद के वर्षों में हेमजीत मालू ने भी इसके संपादकीय एवं सांस्कृतिक प्रयासों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

संगीत और लोक संस्कृति के संरक्षण का संकल्प

“स्वर सरिता” की सबसे बड़ी विशेषता रही कि उसने राजस्थान के लोक संगीत और लोकनृत्यों को केवल प्रकाशित नहीं किया, बल्कि उनके कलाकारों और परंपराओं को व्यापक पहचान दिलाने का प्रयास किया।

23 अप्रैल 2010 को लिखे अपने पत्र में विनोद हरितवाल ने “स्वर सरिता” के मई 2010 अंक की सराहना करते हुए लिखा कि पत्रिका में प्रकाशित लेख ज्ञानवर्धक और रोचक हैं। उन्होंने विशेष रूप से राजस्थान के संगीत और लोकनृत्यों को जीवित रखने तथा उन्हें आगे बढ़ाने में श्री के. सी. मालू के योगदान की प्रशंसा की। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि स्थानीय कलाकारों को अवसर और प्रोत्साहन मिलने से उन्हें राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचने में सहायता मिली।

यह प्रशंसा इस बात को दर्शाती है कि “स्वर सरिता” का उद्देश्य केवल सामग्री प्रकाशित करना नहीं, बल्कि कलाकार और समाज के बीच एक मजबूत सांस्कृतिक सेतु बनाना था।

देश के प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों से मिली सराहना

प्रसिद्ध संगीतज्ञ डॉ. सुशीला रानी पटेल ने अगस्त 2010 में “स्वर सरिता” के जुलाई और अगस्त अंकों की प्रशंसा करते हुए इसकी आकर्षक प्रस्तुति और शोधपूर्ण लेखों की सराहना की। विशेष रूप से भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़े विषयों को गंभीरता और सम्मान के साथ प्रस्तुत करने की भावना ने उन्हें प्रभावित किया।

इसी प्रकार विजय दर्डा, तत्कालीन राज्यसभा सदस्य एवं लोकमत समूह के अध्यक्ष, ने अगस्त 2010 के अपने पत्र में “स्वर सरिता” के तीसरे वर्ष में प्रवेश पर शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने संगीत को भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बताते हुए पत्रिका द्वारा कला, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों को साथ लेकर चलने की प्रशंसा की। पत्रिका द्वारा जल संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर किए गए प्रयासों का भी उन्होंने उल्लेख किया।

इससे स्पष्ट होता है कि “स्वर सरिता” की सोच संगीत तक सीमित नहीं थी। समाज, संस्कृति, पर्यावरण और मानवीय मूल्यों को भी इसमें महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।

पुस्तकालयों और विद्वानों तक पहुँची “स्वर सरिता”

राजस्थान सरकार के डॉ. राधाकृष्णन राज्य केंद्रीय पुस्तकालय की ओर से वर्ष 2009 में प्राप्त पत्र में “स्वर सरिता” के सितंबर और अक्टूबर अंकों की विषयवस्तु और साज-सज्जा को उत्कृष्ट बताया गया। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि पत्रिका के प्राप्त अंकों को पाठकों ने पसंद किया और भविष्य के अंक भी पुस्तकालय में उपलब्ध होते रहने की आशा व्यक्त की गई।

लोककला एवं संस्कृति के विद्वान डॉ. महेन्द्र भानावत, संगीतकार एवं साहित्यकार पंडित विजयशंकर मिश्र, वरिष्ठ चित्रकार डॉ. नाथूलाल वर्मा सहित विभिन्न क्षेत्रों के अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों ने समय-समय पर पत्रिका के प्रयासों की प्रशंसा की।

डॉ. नाथूलाल वर्मा ने वीणा समूह द्वारा आयोजित “राजस्थान उत्सव एवं होली मिलन” जैसे आयोजनों की सराहना करते हुए लिखा कि ऐसे कार्यक्रम राजस्थान के गीत-संगीत और संस्कृति को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कार्यक्रमों से जन-जन तक पहुँचती संस्कृति

“स्वर सरिता” की यात्रा केवल पत्रिका के पन्नों तक सीमित नहीं रही। इससे जुड़े अनेक सांस्कृतिक समारोह, विशेषांक विमोचन और प्रतिष्ठित व्यक्तियों को पत्रिका भेंट करने के अवसर इस अभियान की व्यापकता को दर्शाते हैं।

उपलब्ध ऐतिहासिक तस्वीरों में विभिन्न सांस्कृतिक और सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान “स्वर सरिता” के विशेष अंकों का विमोचन और प्रस्तुति दिखाई देती है। इन आयोजनों ने पत्रिका को पाठकों के साथ-साथ कलाकारों, साहित्यकारों, शिक्षाविदों और सांस्कृतिक संस्थाओं से भी जोड़ा।

ताशकंद तक पहुँची “स्वर सरिता”

“स्वर सरिता” की यात्रा की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि वर्ष 2014 में ताशकंद में आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन से जुड़ी है। उपलब्ध समाचार सामग्री के अनुसार “स्वर सरिता” के एक विशेषांक का विमोचन ताशकंद में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम के दौरान किया गया, जहाँ भारत सहित विभिन्न देशों से आए साहित्यकार, विद्वान और संस्कृति विशेषज्ञ उपस्थित थे।

समाचार में इससे पहले अमेरिका में भी “स्वर सरिता” के एक विशेषांक के विमोचन का उल्लेख मिलता है।

यह उपलब्धि इस बात का प्रतीक है कि राजस्थान की कला और संस्कृति को समर्पित यह प्रयास धीरे-धीरे स्थानीय सीमा से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचा।

के. सी. मालू की सांस्कृतिक दृष्टि

“स्वर सरिता” से जुड़े पुराने पत्रों और दस्तावेजों में बार-बार एक बात सामने आती है—श्री के. सी. मालू का संगीत, कलाकारों और राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत के प्रति समर्पण।

कलाकारों को मंच देना, लोक संगीत को नई पीढ़ी तक पहुँचाना, वरिष्ठ कलाकारों को सम्मान देना, संगीत और साहित्य से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर सामग्री प्रकाशित करना तथा सांस्कृतिक आयोजनों को प्रोत्साहित करना—ये सभी उनके सांस्कृतिक दृष्टिकोण का हिस्सा रहे।

यही सोच आगे चलकर वीणा समूह की पहचान का महत्वपूर्ण आधार बनी।

एक पत्रिका से कहीं अधिक

“स्वर सरिता” के पुराने अंक, प्रशंसा-पत्र, समाचार और तस्वीरें आज केवल ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं हैं। वे उस समय की एक ऐसी सांस्कृतिक यात्रा के साक्षी हैं, जिसमें राजस्थान की मिट्टी की खुशबू, लोक कलाकारों की आवाज, शास्त्रीय संगीत की गरिमा और भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान समाहित है।

“स्वर सरिता” वास्तव में एक पत्रिका से बढ़कर संगीत और संस्कृति को समर्पित एक आंदोलन रही है—एक ऐसा प्रयास, जिसने राजस्थान की परंपराओं को सहेजते हुए उन्हें देश और दुनिया तक पहुँचाने का काम किया।

और इस यात्रा के केंद्र में रहा एक ही संकल्प—

“अपनी संस्कृति को सहेजना, कलाकारों को सम्मान देना और आने वाली पीढ़ियों तक अपनी सांस्कृतिक विरासत पहुँचाना।”